चौरसिया सामाजिक संगठन का इतिहास अखिल भारतीय चौरसिया महासभा, कोलकाता

भारत की विशालता सभ्यता और संस्कृति को गाथा अखंड भारत का इतिहास आज के भौतिक युग में गौण सा प्रतीत होता है। रामायण वेद, उपनिषद, गीता आदि ग्रन्थों के माध्यम से हम कुछ कुछ अपने पूर्वजों के महान आदर्शो परोपकार, सामाजिकता ईश्वर भक्ति, आपसी प्रेम, सदूभावना के विषय में ज्ञागमय होकर कुछ अच्छा करने की ठान लेते है लेकिन वास्तव में आज का युग स्वार्थी युग॒बन गया है। देश को आपसी मत भेद के कारण विदेशियों ने जम कर लुटा | इस देश पर राज्य किया, हमारी सम्यता संस्कृति आपसी भाई चारा को छिन्‍न भिन्‍न कर दिया।

1857 वे वर्ष में देश के खुद्धार राजाओं एवं देश भक्तों ने एकता कुछ हद तक बना कर विदेशीयों के खिलाफ तथा अपनी आजादी के लिये कमर कस ली थी। लोगो में संगठन की भावना न जोड़ पकड़ा ओर दुश्मनों की नींव हिलाने में कामयाव रहे। यह स्वर्णिम युग की शुरूआत थी जब जगह जगह जन जागरण का उदय होना प्रारम्भ हुआ। लोगो में भाईचारा एकजुटता की आवश्यकता ने समाज में संगठनात्मक विचारधारा ने जन्म लिया। 1910 के आस पास कर्मों एवं व्यवसाय पर आधारित संगठन एवं समाज सुधारको और अध्यात्मवाद के प्रति जागरूकता ने जोड़ पकड़ना शुरू हो गया। जगह जगह संगठन बनने लगे। बरई, तमोली, चौरसिया, नागवर्शी बारी कुमरावत पंसारी भी इससे अछुते नहीं रहे । जन जागरण जाति विशेष संगठनों में परिवर्तित होता गया। हिन्दुओं में वर्ग, उपर्वग, जाति भेद,अछुत भावना, वलात धर्म परिवर्तन आदि जोड़ो पर था। ऐसे में नाथु राम मोदी जो पेशे से वकील थे तथा स्वामी दयानन्द से एवं देश भक्ति से प्रेरित थे। उनका युवा दिल समाज की दशा देख उवाल खाने लगा मन विचलित था। क्या होगा हमारे समाज का चिन्तन करते करते जरूरत की विस्तृत जानकारी जुटाने में लग गये। गांव गांव जाकर ग्रामिणों से दंत कथाओ का पता लगाते रहे। सामग्री बटोरते रहे, संकलित करते रहे, प्रथम जनगणना की रिपोट से सासंकलित करते रहे, प्रथम जनगणना की रिपोट से सामग्री जुटाई । (पहली जनसंख्या रिपोंट में जाति का वर्णन दिया गया था। ) Nesfield s census brief on studin hindu tribas and cast के अनुसार बरई जाति की समाज में सम्मानजनक स्थिति थी। कहावतो के अनुसार बरई की रिपोर्ट में ब्राह्मण का दर्जा दिया गया। अकस्मात ही एक दिन मोदी जी को दयानन्द जी के प्रवचन स्थान पर सुखी लाल कठियार नामक वकील से मुलाकात हुई और दोनो की मित्रता स्वजातिय प्रेम और समाजिकता जिसका नतीजा सन 1916 के अप्रैल माह में जातिय सम्मेलन का शुभारम्भ हुआ। जब तक हमारे समाज की मानसिकता एक बिन्दु पर एक मत नहीं होगा, तब तक हम विकासशील समाज का निर्माण नहीं कर सकते | मतभेद छोड़ समाज हित | विचारधारा से जुड़ कर स्वार्थहीन भावना से ग्रस्त ने होकर एक मंच पर आने की चेष्टा करेंगें तभी समाज रूपी संगठन ससकत होकर समाजोत्थान में सक्रिय भूमिका निभायगा | हमारे जो बन्धु एकता, एकजुटता के अभाव में समाजोत्थान के लिये आगे आने से डरते है, उन्हें भी बल मिलेगा, प्रेरणा मिलेगी, क्योंकि हमारे जाति में प्रतिभा की कमी नहीं। केवल उन्हें प्रेरणा, प्रोत्साहन और समाज की मदद मिले तो ये लोग करिश्मा कर सकते है।

हम अपने अस्तित्व का इस विषय पर सर्वश्री सुखी लाल कठियार (इटावा) श्री नाथुराम मोदी (जबलपुर) सेठ भैयालाल (मुम्बई) रायसाहब जंगी लाल (लखनऊ), लक्ष्मी नारायण (वाराणसी) सहित अनगिनत समाज सेवको ने समाज को 1916 में संगठित किया तथा विभिन्‍न स्थानों पर सम्मेलन किया जाने लगा | संस्था का नाम अखिल भारतीय बरई महासभा रखा गया। संस्था का नामः अखिल भारतीय बरई महासभा

वर्ष स्थान अध्यक्ष निवासी
1916 जबलपुर श्री सुखी लाल कटियार इटावा
1917 इटावा वही इटावा
1918 आगरा श्री मूलचंद आगरा
1922 लखनऊ श्री साहबदीन बरई
1923 फतेहपुर सेठ श्री मेवालाल मुम्बई
1924 बाढ़ (पटना) वही मुम्बई
1925 कानपुर वही मुम्बई
(सभा में संस्था का नाम संशोधित कर, अखिल भारतीय बरई ताम्बोली महासभा रखा गया
1926 हाजीपुर श्री नाथुराम मोदी वकील जबलपुर
1927 नालन्दा प्रो. श्री जे.एस. समादार पटना
1929 गया रायसाहब श्री बंशीलाल बाढ़
1930 महोबा रायबहादुर री यदुनाथ मजुमदार जैसोर
1932 वाराणसी प्रो. डॉ. एम.एन.सरकार कोलकाता
1933 इलाहाबाद स्वामी क्षेत्रनाथ सेन कोलकाता
1935 कानपुर रायसाहब श्री बंशीलाल बाढ़
1937 बाढ़ श्री शिवदयाल सिंह चौरसिया लखनऊ
1938 कानपुर श्री रामचत्री प्रसाद चौधरी हाजीपुर
1940 गया श्री शिव दयाल सिंह चौरसिया लखनऊ
1941 सारण वही
1943 समस्तीपुर मैजिस्ट्रेट श्री हनुमान भगत दरंभंगा
1944 दरभंगा श्री मुसाहब महतो
1946 सीता मढी मैजिस्ट्रेट श्री हनुमान भगत दरंभगा
1949 पटना श्री बिन्दा प्रसाद हाजीपुर
1950 गया मैजिस्ट्रेट श्री हनुमान भगत दरंभंगा
1953 वाराणसी जस्टिस श्री हनुमान भगत दरभंगा
1954 कोलकता श्री विश्वनाथ भगत चक्रधरपुर

अखिल भारतीय चौरसिया समाज की स्थापना 26 जनवरी 1950 सागर मध्य प्रदेश में हुई। संगठन के अग्रण्य नेता जिन्होंने अपना तन मन-धन न्यौछावर किया। वे हैं श्री ठाकुर प्रसाद जी, श्री सीता राम जी वैषणव, श्री देवी दास जी, श्री विश्वनाथ जी भगत आदि का नाम धन्य है। 24-25 अक्तूबर 1950 को अखिल भारतीय चौरसिया समाज का आयोजन सागर मध्य प्रदेश में किया गया था। जिसके आयोजन कर्ता प्राचार्य डाक्टर, शंकर दयाल चौरसिया संगरक्षक, अखिल भारतीय चौरसिया महासभा मध्य प्रदेश निवासी ने की। इतना ही नहीं, भारत सरकार द्वारा गठित इस पिछड़ा वर्ग को संविधान के विरूद्ध स्वाभिमान के लिए घातक, शिक्षा मनोविज्ञान विरोधीहीन भावना का पोषण घोषित किया गया था। वास्तव में सागर मध्य प्रदेश के सममेलन में चौरसिया महासभा के गठन को मूर्त रूप देना प्रारम्भ हुआ। इसलिए चौरसिया संदेश मासिक पत्रिका सागर से प्रकाशित करने का निश्चय लिया गया। इस सम्मेलन के संयोजक डाक्टर शंकर दयाल जी को प्रधानमंत्री मनोनित किया गया। कार्य में गति लाने हेतु श्री मोतीलाल प्रसाद जी शिक्षक कैमूर मध्य प्रदेश को सहमंत्री बनाया गया। देश की स्वतंत्रता के साथ साथ समाज के सुधार और संगठन की इच्छा बलबती हुई। एक नाम, एक विधान तथा एक संगठन का ध्येय बनाया गया। चौरसिया शब्द को ही अखिल भारतीय संगठन का मूलधार बनाकर असंख्य विभिन्‍न नामों को हटाकर मात्र चौरसिया शब्द को प्रतिष्ठित करने का आश्वासन दिया गया। गत वर्षों में अखिल भारतीय बरई महा सभा के एकीकारण हेतु अनेक बैठक का आयोजन कर एक संगठन तथा एक छतरी के नीचे सदैव रहने का प्रयत्न किया गया। देश की स्वन्त्रता आंदोलन लहर के साथ जातियों का व्यवसायों से सम्बन्ध छुट चुका था।

सभी जाति और वर्ग के लोग पान उत्पादन, तथा व्यवसाय में आ चुके थे। इस स्थिति में बरई, ताम्बोली जैसे हमारे पुराने सम्बोधन अपना जातीय संकेत खो चुके थे। इसलिए सामाजिक संगठन के लिए बरई तम्बोली आदि के स्थान पर सुन्दर एवं लोक प्रियता, अमुक्त चौरसिया शब्द पर ही सदैव बल दिया गया जो तर्क संबद्ध विवेकपूर्ण एवं जन प्रिय हैं। अखिल भारतीय वरई महा सभा की कार्यकारिणि तथा महाधिवेशन के मंचों से प्रचण्ड बहुमत से चौरसिया नाम का समर्थन महासभाओं के एक नाम रखने की दिशा में मील का पत्थर प्रमाणित हुआ प्रांतीय तथा क्षेत्रीय भावना से उठकर केवल अखिल भारतीय चौरसिया महासभा को ही सर्वोपरिता प्रदान की है। 31 दिसम्बर 54 एवं 16 फरवरी 78 दोनों कोलकाता अधिवेशनों की 25 वर्ष की अवधि में एक नाम तथा संगठन की दिशा में है। 31 दिसम्बर 54 एवं 16 फरवरी 78 दोनों कोलकाता अधिवेशनों की 25 वर्ष की अवधि में एक नाम तथा संगठन की दिशा में काफी प्रगति हुई।

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